नई दिल्‍ली: भारतीय कानून संहिता यानि IPC की धारा 124A की समीक्षा करते समय अक्सर एक तथ्य लोग भूल जाते हैं कि देशद्रोह और राजद्रोह दोनों ही अलग अलग विंदु हैं। देश स्थायी है और राज बदलता रहता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज जो अध्यक्ष पीठ के दाहिने बैठ रहा है वह कल अध्यक्ष पीठ के बाएं बैठ सकता है। और जो बाएं बैठ रहा है वह दाहिने आ सकता है। दाहिना पक्ष सत्ता का और बायीं तरफ का स्थान विपक्ष के लिये संसदीय परम्परा में रूढ़ हो गया है। धीरे धीरे वामपंथ शब्द विपक्ष के लिए रूढ़ हो गया और वह विरोध का स्वाभाविक पक्ष मान लिया गया। सत्ता परिवर्तन का यह बदलाव लोकतंत्र की खूबी है।

सरकार की आलोचना एक संवैधानिक कृत्य और दायित्व है। इसी लिये दुनियाभर की लोकशाही में संसद, सीनेट, असेंबली या जो कोई भी संबोधन जन प्रतिनिधियों की पंचायत के लिये तय हों उसमे विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, स्पष्टीकरण मांगने, शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन, भाषण और ऐसे कृत्य जो भारतीय दंड संहिता में अपराध की कोटि में नहीं आते हैं, करने का अधिकार है। यह सारे अधिकार संविधान की आत्मा मौलिक अधिकारों से संरक्षित हैं।

धारा 124 A के जन्म, विकास और विवाद पर लेख के अगले अंश में चर्चा होगी, पहले देशद्रोह और राजद्रोह से जुड़ी आइपीसी की धाराओं और उनके दंडात्मक प्राविधान का अवलोकन कर लें।

देशद्रोह पर कोई भी कानून 1859 तक नहीं था, इसे 1860 में बनाया गया और फिर 1870 में इसे IPC में शामिल किया गया, देशद्रोह के इस कानून को थॉमस मैकाले ने तैयार किया था, जिसे अंग्रेजों की विरासत माना जाता है . 

धारा 121 आईपीसी ( Section 121 IPC )
भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना।

121 IPC. Waging, or attempting to wage war, or abetting waging of war, against the Government of India.—Whoever, wages war against the 75 [Government of India], or attempts to wage such war, or abets the waging of such war, shall be  punished with death,  or imprisonment for life and shall also be liable to fine

जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करेगा, या ऐसा युद्ध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा युद्ध करने का दुष्प्रेरण करेगा, तो उसे मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना। सजा – मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास + आर्थिक दण्ड। यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

धारा 122 आईपीसी ( Section 122 IPC )
Collecting arms, etc., with intention of waging war against the Government of India.—Whoever collects men, arms or ammunition or otherwise prepares to wage war with the intention of either waging or being prepared to wage war against the Government of India, shall be punished with imprisonment for life or fine.

जो भी कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने, या युद्ध करने की तैयारी करने के आशय से सैनिक, आयुध या गोलाबारूद संग्रहित करेगा, या अन्यथा युद्ध करने की तैयारी करेगा, तो उसे आजीवन कारावास, या किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे अधिकतम दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है से दण्डित किया जाएगा, और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रहित करना।
सजा – आजीवन कारावास या दस वर्ष कारावास और आर्थिक दण्ड।
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

धारा 123 आइपीसी ( Section 123 IPC )
Concealing with intent to facilitate design to wage war.—Whoever by any act, or by any illegal omission, conceals the existence of a design to wage war against the Government of India intending by such concealment to facilitate, or knowing it to be likely that such concealment will facilitate, the waging of such war, shall be punished with imprisonment of either de­scription for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

युद्ध करने की परिकल्पना को सुगम बनाने के आशय से छिपाना।
जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने की परिकल्पना के अस्तित्वों को, जो ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाने के आशय से इस प्रकार छिपाए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि इस प्रकार छिपाकर ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाए, किसी कार्य, या किसी अवैध लोप द्वारा छिपाएगा, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है से दण्डित किया जाएगा, और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

सजा – दस वर्ष कारावास + आर्थिक दण्ड। यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है। यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

धारा 124 आईपीसी ( Section 124 IPC )
किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोधित करने के आशय से राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना

जो कोई भारत के राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल को ऐसे राष्ट्रपति या राज्यपाल की विधिपूर्ण शक्तियों में से किसी शक्ति का किसी प्रकार प्रयोग करने के लिए या प्रयोग करने से विरत रहने के लिए उत्प्रेरित करने या विवश करने के आशय से, उन पर हमला करेगा या उसका सदोष अवरोध करेगा, या सदोष अवरोध करने का प्रयत्न करेगा या उसे आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करेगा या ऐसे आतंकित करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा।

धारा 124 A आईपीसी ( Section 124 A IPC ) – राजद्रोह
Whoever by words, either spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to excite disaffection towards, the Government established by law in India, a shall be punished with imprisonment for life, to which fine may be added, or with imprisonment which may extend to three years, to which fine may be added, or with fine.

जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण 1– अप्रीति पद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं ।
स्पष्टीकरण 2– घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उनको परिवर्तित कराने की दृष्टि से अननुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं ।
स्पष्टीकरण 3–घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार की प्रशासनिक या अन्य व्रिEया के प्रति अनुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध गठित नहीं करती।

इस प्रकार आइपीसी की धारा 121 से लेकर 124 A तक की यह परिभाषाएं और दंडात्मक प्राविधान हैं। 121, 122, और 123 देश के विरुद्ध युद्ध के संदर्भ में है  और 123 तथा 124 राज के प्रतीक के राष्ट्रपति और राज्यपाल से सम्बंधित है। राष्ट्रपति की जगह पहले क्राउन हुआ करता था जो बाद में संशोधित कर दिया गया।

धारा 124 A जिसे अंग्रेजी में सेडिशन कहा जाता है उसमें राज के स्थान पर सरकार शब्द आ गया और सरकार की आलोचना कुछ स्पष्टीकरण के साथ भी दंडात्मक कर दी गयी है। इस धारा का आइपीसी में जोड़ा जाना और आज़ादी के बाद इस धारा को बनाये रखा जाय या न रखा जाय इस पर बहुत रोचक बहसें संविधान सभा मे हुयी है, क्योंकि कि यह इस धारा के प्राविधान संविधान के लोकतांत्रिक स्वरूप और मौलिक अधिकारों को भी अतिक्रमित करते हैं ।

जब देशद्रोह की बात हो ही रही है तो ये भी देख लीजिए ये किन लोगों पर लगाया गया ?

मसलन 1922 में ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था, वजह थी उस दौर की सत्ता के खिलाफ लिखना, क्यों कि महात्मा गांधी एक अखबार में जिसका नाम यंग इंडिया था, उसमें सरकार के खिलाफ लिखा करते थे तो देशद्रोह का मुकदमा उनके खिलाफ दायर किया गया .

2012 में तमिलनाडु सरकार ने कुडनकुलम परमाणु प्लांट का विरोध करने वाले 7 हजार ग्रामीणों पर देशद्रोह की धाराएं लगाईं थी, क्यों कि तब इन ग्रामीणों ने सत्ता का विरोध किया था .

बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर 1962 में तत्कालीन सरकार ने देशद्रोह का आरोप लगाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी, दरअसल उस दौर की सरकार को केदारनाथ सिंह का भाषण पसंद नहीं आया था, इसलिए इसे देशद्रोह करार दे दिया गया, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई और सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की एक बेंच ने ये आदेश भी दिया था कि देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े .

महात्मा गांधी ही नहीं बाल गंगाधर तिलक, जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, लेखिका अरुंधति रॉय, पटेलों के नेता हार्दिक पटेल जैसे कई लोगों पर देशद्रोह का आरोप लग चुका है .

हैरान करने वाली बात ये है कि जिस कानून को भारत में ब्रिटिश सरकार ने बनाया था, उसे खुद वो ब्रिटेन से हटा चुके हैं लेकिन भारत में ये आज भी चल रहा है .

राहुल गांधी ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी इसका विरोध किया था, उन्होने इसे बेहद आपत्तिजनक और अप्रिय कानून बताया था .

अब आप ये भी जान लीजिए कि आखिर ये कानून सुर्खियों में क्यों रहता है, क्यों राहुल गांधी ने इसे खत्म करने का ऐलान किया है, दरअसल देशद्रोह के कानून को लेकर संविधान में विरोधाभास है, क्यों कि हमारे संविधान में देशद्रोह कानून (IPC की धारा 124A ) तो है लेकिन साथ ही साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ) का अधिकार भी है, जिसे हम अपने मौलिक अधिकार के रुप में जानते हैं और अगर ये हमारी अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत आता है तो फिर ये देशद्रोह कैसे हुआ ?
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