नई दिल्ली: प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता वाली उच्‍च स्‍तरीय चयन समिति की बैठक के बाद गुरुवार शाम को सीबीआई निदेशक पद से आलोक वर्मा को हटा दिया गया. चयन समिति में पीएम नरेंद्र मोदी के अलावा कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एके सीकरी शामिल थे. समिति ने वर्मा को पद से हटाने पर 2-1 की बहुमत से अपना फैसला लिया. 

सूत्रों के मुताबिक, समिति की बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे ने आलोक वर्मा को पद से हटाने पर आपत्ति जताई थी. अतिरिक्त निदेशक एम नागेश्वर राव नए निदेशक की नियुक्ति या अगले आदेश तक फिलहाल सीबीआई निदेशक के कामों को देखेंगे.

उच्चस्तरीय चयन समिति की बैठक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को फिर से बहाल करने के बाद हुई थी. सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को नरेंद्र मोदी सरकार ने अक्टूबर में उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया था. 

इससे पहले कांग्रेस ने गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार पर सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के उत्तराधिकारी को खोजने में 'जल्दबाजी' करने का आरोप लगाया. कांग्रेस ने कहा कि बीजेपी सरकार राफेल घोटाले की संभावित जांच से भयभीत है, इसीलिए वह वर्मा का उत्तराधिकारी तलाशने की 'जल्दी' में है.

सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआई निदेशक का न्यूनतम दो साल का कार्यकाल निर्धारित किया था ताकि किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से उन्हें बचाया जा सके. लोकपाल अधिनियम के जरिये बाद में सीबीआई निदेशक के चयन की जिम्मेदारी चयन समिति को सौंप दी गई थी. 

आइए जानते हैं वो 20 Points जो आलोक वर्मा को पद से हटाए जाने का आधार बने.

1. CVC रिपोर्ट में रिसर्च और एनालिसिस विंग (रॉ Research and Analysis Wing) ने एक फोन कॉल इंटरसेप्‍ट किया था, जिसमें ‘सीबीआई के नंबर वन अफसर को पैसे सौंपे जाने’ की चर्चा हुई थी.

2. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति ने केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC सीवीसी) की इस रिपोर्ट पर गौर किया कि मीट कारोबारी मोइन कुरैशी के खिलाफ सीबीआई के नंबर-2 अफसर राकेश अस्थाना हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को आरोपी बनाना चाहते थे पर आलोक वर्मा ने मंजूरी ही नहीं दी.

3. मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी. दो करोड़ रुपए की रिश्वत लिए जाने के भी सबूत थे. इस मामले में वर्मा की भूमिका संदेहास्पद थी. प्रथम दृष्टया उनके खिलाफ मामला बन रहा था. वहीं सना ने एक शिकायत दर्ज कराकर आरोप लगाया था कि कैसे उसने बिचौलियों के जरिए अस्थाना को रिश्वत दी थी.

4. गुड़गांव में एक जमीन खरीदने के मामले में भी वर्मा का नाम सामने आया था. इस डील में 36 करोड़ रुपए का लेनदेन का आरोप है.

5. रेल मंत्री रहे लालू प्रसाद से जुड़े IRCTC से जुड़े एक केस में भी CVC ने पाया कि आलोक वर्मा ने एक अफसर को बचाने के लिए FIR में जान-बूझकर उसका नाम शामिल नहीं किया. साथ ही आलोक वर्मा पर लालू प्रसाद यादव के परिसर में तलाशी नहीं लेने के निर्देश सीबीआई के संयुक्त निदेशक को जारी करने का आरोप था.

6. निदेशक को इन आरोपों को लेकर 14 सितंबर 2018 को कमीशन के सामने जरूरी फाइल और दस्तावेज पेश करने को 3 नोटिस जारी किए गए थे.

7. सीबीआई ने इस मामले में और समय देने का अनुरोध किया, जिससे सुनवाई को 18 सितंबर 2018 तक के लिए टाल दिया गया.

8. सीबीआई ने 18 सितंबर को राकेश अस्थाना के संबंध में कमीशन को लिखी चिट्ठी में कहा था कि संबंधित अधिकारी पर केस में लगे आरोप सच प्रतीत होते हैं. अधिकारी को सीबीआई के पास अपने खिलाफ सबूत होने की भी जानकारी थी. सीबीआई ने कहा था कि राकेश अस्थाना की शिकायत को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह एक दागी अधिकारी की सीबीआई के दूसरे अधिकारियों को धमकाने की कोशिश है. सीबीआई ने कहा था कि वह कमीशन को जरूरी फाइल उपलब्ध कराने को भी तैयार हैं. साथ ही सीबीआई ने शिकायतकर्ता की पहचान भी पूछी थी.

9. सीबीआई की 18 सितंबर की चिट्ठी के संदर्भ में कमीशन ने शिकायतकर्ता की पहचान बताने से इनकार कर दिया था. इसके बाद कमीशन ने सीबीआई डायरेक्टर को अपने तीन पुराने नोटिस को दोहराया और सभी दस्तावेज और फाइल 20 सितंबर तक पेश करने को कहा.

10. सीबीआई ने 24 सितंबर को लिखा कि रिकॉर्ड हजारों पन्नों में हैं, फाइलें मालखाना, कोर्ट आदि जगहों पर हैं. इन्हें पेश करने के लिए तीन हफ्ते चाहिए. कमीशन ने कहा कि इन्हें यथाशीघ्र पेश किया जाए. हालांकि, सीबीआई हेडक्वॉर्टर में मौजूद नोटशीट फाइल को 28 सितंबर तक पेश करने को कहा.

11. कमीशन ने 9 अक्टूबर को सीबीआई की चिट्ठी के आधार पर कहा कि सीबीआई से शिकायत के संबंध में फाइलें मांगे हुए एक महीने का समय हो गया है. कमीशन ने माना कि सीबीआई की फाइल सार्वजनिक संपत्ति नहीं है, लेकिन इसे सक्षम अधिकारी देख सकता है. कमीशन ने फिर से सीबीआई निदेशक को जरूरी जांच में मदद देने की सलाह दी और 22 अक्टूबर तक दस्तावेज दिखाने को कहा, लेकिन 23 अक्टूबर तक न तो दस्तावेज दिए गए और न ही समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया गया.

12. सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने कई बार आलोक वर्मा पर मौखिक और लिखित आरोप लगाए और कहा कि उनके द्वारा लगाए गए 6 आरोपों की जांच से आलोक वर्मा और एके शर्मा को अलग किया जाए. इसके बाद कमीशन ने 25 सितंबर को कहा कि कमीशन को सीबीआई के किसी अधिकारी के खिलाफ सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन जांच में निष्पक्षता बरतनी चाहिए.

13. 25 सितंबर को सीबीआई निदेशक को एक और चिट्ठी भेजी गई और कहा गया कि कमीशन द्वारा मांगी गई जानकारी के बारे में कई रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन 10 माह बीतने पर भी कोई एक्शन नहीं लिया गया. इस बारे में हुई आतंरिक रिपोर्ट का नतीजा 3 अक्टूबर तक बताने को कहा गया.

14. 3 अक्टूबर तक कोई जवाब नहीं मिलने पर सीबीआई निदेशक से सीवीसी से 4 अक्टूबर को राकेश अस्थाना के प्रतिनिधित्व के संदर्भ में मुलाकात करने को कहा गया. इसमें सीबीआई निदेशक नहीं आए.

15. 15 अक्टूबर को एक और चिट्ठी सीबीआई निदेशक को भेजी गई. इसमें सीबीआई के किसी भी अधिकारी के खिलाफ जांच से पहले आवश्यक अनुमति लेने को कहा गया. सीबीआई निदेशक से फिर से जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने को कहा गया.

16. पता चला कि 15 अक्टूबर को सीबीआई ने हैदराबाद के सतीश बाबू सना की शिकायत पर केस दर्ज किया है, जो सीबीआई के विशेष निदेशक द्वारा जांच किए जा रहे मामले में आरोपी है. इस बारे में विशेष निदेशक का दावा है कि उन्होंने इसकी गिरफ्तारी की इजाजत मांगी थी, जो सीबीआई निदेशक से नहीं मिली. राकेश अस्थाना कमीशन के सामने 12, 18, 19 और 20 अक्टूबर को पेश हुए.

17. 20 अक्टूबर को निदेशक को सीबीआई के डीएसपी देविंदर कुमार ने चिट्ठी लिखी कि सतीश बाबू से उनके संपर्क के झूठे आरोपों में उनके घर की तलाशी ली जा रही है, जबकि उन्होंने पहले ही सतीश की गिरफ्तारी और पूछताछ करने की अपील की थी, जिसे आज तक मंजूरी नहीं मिली. उन्होंने कहा कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है. कमीशन को यह चिट्ठी 22 अक्टूबर को मिली.

18. 22 अक्टूबर को सीबीआई की SIT के संयुक्त निदेशक साईं मनोहर ने कमीशन को राकेश अस्थाना के रिकॉर्ड के हवाले से चिट्ठी लिखी कि मोइन कुरैशी केस में सूत्रों के हवाले से पता चला है कि सीबीआई निदेशक को 2 करोड़ रुपये की घूस दी गई.

19. कमीशन ने माना कि सीबीआई निदेशक जांच में मदद नहीं कर रहे हैं और कोई फाइल उपलब्ध नहीं कराई. तीन हफ्ते मांगने के बाद भी कोई रिकॉर्ड सबमिट नहीं किया गया.

20. रिपोर्ट में कहा गया कि CVC एक्ट के सेक्शन 8 (1) (a) सीवीसी को सीबीआई के कार्यों की निगरानी करने का अधिकार है. जहां तक भ्रष्टाचार के इन आरोपों की बात है, तो भ्रष्टाचार कानून के तहत सीवीसी इसकी जांच करने के लिए प्रतिबद्ध है. दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (DSPE Act) का सेक्शन- 4 (1) सीवीसी को सीबीआई की निगरानी करने का अधिकार देता है. इसके अलावा CVC एक्ट का सेक्शन 8 (1) (a) और (b) भी सीवीसी को सीबीआई के कार्यों की superintendence करने का अधिकार देती है. इसको अलावा सुप्रीम कोर्ट ने भी superintendence की व्याख्या की है. भ्रष्टाचार कानून के तहत आलोक वर्मा के खिलाफ केस दर्ज हैं और कई मामलों की जांच किया जाना बाकी है. ऐसे में उनको डायरेक्टर पद की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
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