हिंदू धर्म में स्‍वास्‍तिक का बहुत महत्‍व है, किसी भी मंगल कार्य का हिन्दू धर्म में पहले स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है और उसके बाद ही मंगल कार्य का शुभारम्‍भ किया जाता है। स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल प्रतीक भी माना जाता है। स्वास्तिक शब्द का उद्भव संस्‍कृत के 'सु' और 'अस्ति' से मिलकर बना है। यहां 'सु' का अर्थ है शुभ और 'अस्ति' से तात्पर्य है होना। स्‍वास्तिक का अर्थ है 'शुभ हो', 'कल्याण हो'। स्‍वास्तिक के चिन्‍ह का इस्‍तेमाल कई सदियो से हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में होता आ रहा है। प्राचीन समय में एशिया आने वाले पश्चिमी यात्रियों इस चिन्‍ह के सकारात्‍मकता से प्रभावित होकर घर लौटने पर अपने घरों पर इसका इस्‍तेमाल करने लगे। 20 वीं शताब्‍दी आते आते स्‍वास्तिक पूरे विश्‍व में सौभाग्‍य और मंगल कामना के रुप में इस्‍तेमाल होने लगा। स्‍वास्तिक के चिन्‍ह का इतिहास बहुत ही पुराना है।

हिंदू धर्म के अलावा दुनिया के कई कोनों में इसका इस्‍तेमाल कई हजारों सालों से होता आ रहा है। लेकिन असल में स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है, इसके पीछे ढेरों तथ्य हैं। स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है। 

चार रेखाओं का महत्‍व 
मान्यता है कि स्‍वास्तिक की यह रेखाएं चार दिशाओं - पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं। कुछ यह भी मानते हैं कि यह चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं। 

चार देवों का प्रतीक 
इसके अलावा इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है। 

मध्य स्थान का महत्‍व 
ह‍िंदू धर्म में माना जाता है कि यदि स्वास्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है, तो फलस्वरूप मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है।

सूर्य भगवान का चिन्ह 
स्वास्तिक की चार रेखाएं एक घड़ी की दिशा में चलती हैं, जो संसार के सही दिशा में चलने का प्रतीक है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यदि स्वास्तिक के आसपास एक गोलाकार रेखा खींच दी जाए, तो यह सूर्य भगवान का चिन्ह माना जाता है। वह सूर्य देव जो समस्त संसार को अपनी ऊर्जा से रोशनी प्रदान करते हैं। 

बौद्ध धर्म में स्वास्तिक 
हिन्दू धर्म के अलावा स्वास्तिक का और भी कई धर्मों में महत्व है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है। 

जैन धर्म में स्वास्तिक 
वैसे तो हिन्दू धर्म में ही स्वास्तिक के प्रयोग को सबसे उच्च माना गया है लेकिन हिन्दू धर्म से भी ऊपर यदि स्वास्तिक ने कहीं मान्यता हासिल की है तो वह है जैन धर्म। हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वास्तिक का जैन धर्म में है। जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है, जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं। श्वेताम्बर जैनी स्वास्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं। 

सिंधु घाटी खुदाई में भी मिले थे स्‍वास्तिक 
सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में सिंधु घाटी से प्राप्त मुद्रा और और बर्तनों में स्वास्तिक का चिन्ह खुदा हुआ मिला उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं में भी स्वास्तिक के चिन्ह मिले हैं। ऐसा माना जाता है हड़प्पा सभ्यता के लोग भी सूर्य पूजा उपासक रहें होंगे। हड़प्पा सभ्यता के लोगों का व्यापारिक संबंध ईरान से भी था। जेंद अवेस्ता में भी सूर्य उपासना का उल्‍लेख पढ़ने को मिलता है। इसके अलावा ऐतिहासिक साक्ष्‍यों जैसे मोहनजोदड़ो हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिलालेखों रामायण, हरिवंश पुराण, महाभारत आदि में स्वास्तिक का अनेकों बार उल्लेख मिलता है। 

जर्मनी में स्वास्तिक 
सिर्फ हिंदू धर्म और भारत में ही स्‍वास्तिक का इस्‍तेमाल नहीं किया जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक जर्मनी में स्वास्तिक का इस्तेमाल किया जाता है। 19वीं सदी में कुछ जर्मन विद्वान, भारतीय साहित्य का अध्ययन कर रहे थे तो उन्होंने पाया कि जर्मन भाषा और संस्कृत में कई समानताएं हैं। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीयों और जर्मन लोगों के पूर्वज एक ही रहे होंगे और ये लोग आर्यन नस्‍ल के वशंज है। यहूदी विरोधी समुदायों ने स्वास्तिक का आर्यन प्रतीक के तौर पर चलन शुरू किया। जिसका परिणाम ये हुआ कि 1935 के दौरान जर्मनी के नाज़ियों ने स्वास्तिक के निशान का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन यह हिन्दू मान्यताओं के बिलकुल विपरीत था। यह निशान एक सफेद गोले में काले 'क्रास' के रूप में उपयोग में लाया गया, जिसका अर्थ उग्रवाद या फिर स्वतंत्रता से सम्बन्धित था। युद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी में इस प्रतीक चिह्न पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। 

15000 साल पुराना स्‍वास्तिक 
मध्य एशिया के देशों में भी स्वास्तिक के प्रतीक को सौभाग्‍य से जोड़कर माना जाता है। प्राचीन इराक में अस्त्र शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वास्तिक के चिन्ह का प्रयोग किया जाता था प्राचीन ग्रीस के अलावा पश्चिमी यूरोप में बाल्टिक से बाल्कन तक में स्‍वास्तिक के इस्‍तेमाल के बारे में उल्‍लेख हैं। यूरोप के पूर्वी भाग में बसे यूक्रेन में 1 नेशनल म्यूजियम स्थित है इस म्यूजियम में कई तरह के स्वास्तिक चिन्ह देखे जा सकते हैं जो कि 15000 साल तक पुराने हैं। 

इंग्‍लैंड और अमेरिका में भी स्‍वास्तिक 
इंग्लैंड के आयरलैंड के कई स्थानों पर प्राचीन गुफाओं में स्वास्तिक के चिन्ह मिले है , बुल्गारिया की देवेस्तेश्का गुफाओं (Devetashka cave) में 6000 वर्ष पुराने स्वास्तिक के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। अमरीकी सेना ने पहले विश्व युद्ध में इस प्रतीक चिह्न का इस्तेमाल किया। ब्रितानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों पर स्‍वास्तिक चिह्न का इस्तेमाल 1939 तक होता रहा था। 

कई कम्‍पन‍ियां भी कर चुकी है इसका इस्‍तेमाल 
कोका कोला तक इस चिन्‍ह का इस्तेमाल कर चुका है। कार्ल्ज़बैर्ग बियर की बोतलों पर इस चिन्‍ह का इस्‍तेमाल किया गया था। 'द ब्वॉय स्काउट्स' ने इसे अपनाया और 'गर्ल्स क्लब ऑफ़ अमरीका' ने अपनी मैगज़ीन का नाम स्वास्तिक रखा। यहां तक कि उन्होंने पाठकों को इनाम के तौर पर स्वास्तिक चिह्न भेंट किए। 

विभिन्‍न देशों में 
नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजा जाता हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों भी स्‍वास्त्कि को मंगल प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

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