कुलदीप राणा, संवाददाता, रुद्रप्रयाग
‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बस यही निशा होगा’’। ये पंक्तियां वास्तव में हकीकत को बयान करती हैं रुद्रप्रयाग जिले में। कारगिल युद्ध में देश के लिए शहीद हुए रुद्रप्रयाग के तीन वीर बहादुर सैनिकों की परिवारों की सरकारों ने 20 वर्षों बाद भी कोई खास सुध नहीं ली है। शहीदों के परिवारों के की गई सरकारी घोषणायें बस राजनेताओं और अफसरों के बयानों तक सिमट कर रह गई हैं। हर साल कारगिल शहीद दिवस 26 जुलाई को शहीदों को याद कर उनकी विधवाओं को एक अद्त शाॅल प्रदान कर उनकी पतियों की वीर गाथाओं और बहादुरी के किस्से जरूर सुनाये जाते हैं, लेकिन शहीदों के नाम पर की गई घोषणायें धरातल पर नहीं उतर पाती हैं। 

कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा मनवाते शहीद हुए रुद्रप्रयाग जिले के तीन जाबाज सैनिकों को हर बार कारगिल दिवस पर याद कर उनकी वीर गाथायें मंचो से जरूर याद की जाती हैं लेकिन सरकारों द्वारा शहीदों के नाम पर स्कूल काॅलेज और मोटरमार्गों के नाम करने वाली घोषणायें आज भी जमीन पर नहीं उतर पाई हैं। उनके क्षेत्र में शहीदों के स्मारक तक नहीं बनाये गए हैं। हालांकि राजनेता और अफसर मानते हैं कि शहीदों के लिए सरकार संजीदा है। 

सरकारों की बयानबाजी और अफसरों की कागजी कार्यवाही से इतर शहीदों की विधवाओं का कहना है कि सरकार हर साल शहीदों की चिताओं पर मेलों का आयोजन कर उनकी बाहादुरी के किस्से तो सुनाती है लेकिन उनके सम्मान में शहीदों के नाम न स्कूल मोटरमार्गो का नाम हुआ है और न स्मारक बने हैं। यहां तक की सरकारों ने नौकरी देने की घोषणा भी की थी लेकिन 20 साल गुजर जाने के बाद भी कुछ नहीं हो पाया है। 

कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले गोविन्द सिंह, भगवान सिंह और सुनील दत्त काण्डपाल के परिवार के लोग हैं जो शहीदों के प्रति सरकार की बेरूखी का आलम बयां कर रही हैं। वास्तव में सरकारें शहीदों के साथ भद्दा मजाक कर रही हैं।

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