नई दिल्ली: आधार कार्ड अनिवार्यता मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पूरी हो गई है। 38 दिनों तक चली इस सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला अगली तारीख़ के लिए सुरक्षित रखा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने करीब चार महीने के दौरान 38 दिन इन याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ ने आज सभी संबंधित पक्षकारों को इस मामले में तत्काल अपनी लिखित दलीलें पेश करने का निर्देश दिया है। बता दें कि 17 जनवरी को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई थी।

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस ए के सीकरी, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं। संविधान पीठ आने वाले दिनों में तय करेगी कि आधार निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है या नहीं।

इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल और विभिन्न पक्षकारों की ओर से कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, राकेश द्विवेदी, श्याम दीवान और अरविन्द दातार सरीखे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपनी अपनी दलीलें पेश की।

सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने आधार नंबरों के साथ मोबाइल फोन जोड़ने के निर्णय का बचाव करते हुये कहा कि यदि मोबाइल उपभोक्ताओं का सत्यापन नहीं किया जाता तो उसे शीर्ष अदालत अवमानना के लिए जिम्मेदार ठहराती। हालांकि, कोर्ट ने कहा था कि सरकार ने उसके आदेश की गलत व्याख्या की और उसने मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए आधार को अनिवार्य बनाने के लिये इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के एस पुत्तास्वामी और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे रखी है। शीर्ष अदालत सरकार की इस दलील से सहमत नहीं थी कि लोक सभा अध्यक्ष ने आधार विधेयक को सही मायने में धन विधेयक बताया था क्योंकि यह समेकित कोष से मिलने वाले कोष से दी जा रही सब्सिडी से संबंधित है। 

अब इस मामले में जब तक सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला नहीं आ जाता तब तक किसी भी सरकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता पर रोक लगा दी गई है। इतना ही नहीं मोबाइल सिम, बैंक खाते से आधार नंबर को जोड़ने जैसी तमाम आदेश को ये फ़ैसला प्रभावित करेगा।

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