जोशीमठ। उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा के चौथे धाम भगवान बदरीनाथ के कपाट आज भक्तों के लिए खोल दिए गए है। सुबह 4.30 बजे पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कपाट खोले गए। इसके बाद डोली को गर्भगृह में स्थापित किया गया। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही के साथ ही भक्तों ने अपने भगवान के दर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया जयकारों के साथ भक्त अपनी आवाज बद्रीविशाल तक पहुंचाने की कोशिश में लग गए। इस दौरान हजारों की संख्या श्रद्धालु वहां मौजूद रहे। 


बदरीनाथ हिंदुओं का सबसे बड़ा धाम है और इसे मोक्ष धाम भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां आने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। बदरी-केदार मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह ने बताया कि बदरीनाथ धाम में सभी जरूरी व्यवस्थाओं को सुचारू कर लिया गया है, ताकि यहां यात्रियों की किसी भी तरह की कोई दिक्कत ना हो।

मंदिर में रंग-रोगन, विश्राम गृहों में आवासीय व्यवस्था, विद्युत, पीने के लिए पानी, टोकन काउंटर और स्वागत कक्ष सहित सभी कार्य पूरे पहले ही पूरे हो चूके थे, ताकि बदरीनाथ धाम में आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन करने में किसी भी प्रकार की कोई परेशानी न हो।

बदरीनाथ धाम को चार धामों में से एक माना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। जहां हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान बदरी विशाल के दर्शन के लिए आते हैं।

इस कारण पड़ा इस क्षेत्र का नाम बदरीनाथ

 इसके पीछे रोचक कथा है, माना जाता है कि इस क्षेत्र में बदरी (बेड) का जंगल होने से यहां का नाम बदरीनाथ पड़ा। इस बारे में कहावत है कि 'जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी' यानी जो व्यक्ति बदरीनाथ के दर्शन कर लेता है, उसे पुनः माता के गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता। माना जाता है बदरीनाथ के दर्शन मात्र से ही इंसान को पापों से मुक्ति मिल जाती है।

धार्मिक मान्यता है कि एक बार देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु से रूठकर मायके चले गयी थी। तब भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए तपस्या में लीन हो गए। कहा जता है जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई, तो देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को ढूंढते हुए उस जगह पहुंच गई, जहां भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे। उस समय उस स्थान पर बदरी (बेड) का जंगल था।

माना जाता है कि भगवान विष्णु ने बेड के पेड़ में बैठकर तपस्या की थी। इसलिए लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को बदरीनाथ नाम दिया। बदरीनाथ की मूर्ति शालिग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर आदिगुरू शंकराचार्य ने स्थापित की थी। मंदिर के कपाट खुलते ही लोग भगवान बदरीनाथ के दर्शन के लिए लालायित रहते हैं।

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